प्रस्तुत है आनंद सकलानी जी की कविता जो की मुझे बहुत पसंद है-
अकेले तुम नही कहते
तुम्हारे इश्क में जाना
मेरे सब दोस्त घरवाले
मुझे आवारा कहते हैं
मेरी मंजिल कहाँ हो तुम
सफ़र अब कितना है बाकि
मेरे पैरों के ये छाले
मुझे आवारा कहते हैं
तुम्हारी याद से फुर्सत हो
तो इनकी भी सुनु बातें
मेरे कमरे के ये जाले
मुझे आवारा कहते हैं
तेरे नैनो की मस्ती में
मैं अपने आप खो बैठा
शराबों के भरे प्याले
मुझे आवारा कहते हैं